प्रगति || Progress


प्रगति
(Progress)


'प्रगति' शब्द के बारे में कोई एक मत नहीं है क्योंकि प्रत्येक काल, देश और व्यक्ति के लिए इस शब्द का अलग-अलग अर्थ हो सकता है। उदाहरण के लिए, उन्नत देशों में प्रगति का मापदण्ड भौतिक उन्नति (Material Progress) है। जो देश आर्थिक दृष्टिकोण से जितना आगे बढ़ा हुआ है, उसे उतना ही प्रगतिशील देश माना जाता है। भारत और विश्व के अन्य देशों के धार्मिक गुरुओं ने आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Progress) को ही वास्तविक प्रगति माना है। यद्यपि यह धारणा अब बदल रही है। प्रत्येक युग में प्रगति की अवधारणा भी बदलती है। सतयुग में प्रगति का जो अर्थ था, कलयुग में वह निश्चय ही परिवर्तित हो गया है। विश्वस्तरीय संगठन जैसे यू.एन.ओ. (U.N.O.) ने मानव संसाधन को जीवन स्तर (Living Standard) की बेहतरी या प्रगति का सूचक माना है। आइए, सामाजिक प्रगति के अर्थ एवं परिभाषा को समझे।


प्रगति का अर्थ एवं परिभाषाएँ
(Meaning and Definitions of Progress)

'प्रगति' शब्द अंग्रेजी के 'Progress', शब्द का हिन्दी रूपांतर है। ये शब्द लैटिन के (Progreditior) शब्द से निकला है। इसका अर्थ 'आगे बढ़ना' (To step forward) है। इस प्रकार प्रगति का साधारण अर्थ किसी इच्छित अथवा वांछित लक्ष्य की और बढ़ना है।

परन्तु चूंकि समाजों के लक्ष्यों में समानता नहीं होती, अतः साधारण तौर पर यह कहा जा सकता है कि समाज में कल्याणकारी परिवर्तनों को ही सामाजिक प्रगति कहते हैं। निम्नलिखित कुछ परिभाषाओं से प्रगति का अर्थ और भी स्पष्ट हो जाएगा-

ऑगवर्न तथा निमकॉफ- "प्रगति का अर्थ होता है अच्छाई के लिए परिवर्तन, और इसलिए प्रगति में मूल्य निर्धारण होता है।"

हॉरनेल हार्ट- "सामाजिक प्रगति सामाजिक ढाँचे में वे परिवर्तन हैं जो कि मानवीय कार्यों को मुक्त करें, प्रेरणा और सुविधा प्रदान करें तथा उसे संगठित करें।"

लेस्टर वार्ड- "प्रगति वह है जो मानवीय सुख की वृद्धि करती है।"

लुम्ले - "प्रगति परिवर्तन है, किन्तु यह परिवर्तन इच्छित अथवा मान्यता प्राप्त दिशा में परिवर्तन है, न कि किसी भी दिशा में परिवर्तन।"


सामाजिक प्रगति की प्रमुख विशेषताएँ (Main Characteristics of Social Progress)

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर, सामाजिक प्रगति की कुछ निम्नलिखित प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख किया जा सकता है-


(1) परिवर्तन की दिशा (Direction of Change)- सामाजिक प्रगति की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि प्रगर्ति में परिवर्तन एक निश्चित, इच्छित अथवा मान्यता प्राप्त दिशां में होता है। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है की सामाजिक प्रगति एक उद्देश्यपूर्ण परिवर्तन है। लूम्ले ने अपनी परिभाषा में प्रगति की इसी विशेषता पर अत्यधिक बल दिया है।


(2) सचेत प्रयत्न (Conscious Efforts) - सामाजिक प्रगति कभी भी आप से आप नहीं होती। जब समाज के सदस्य समाज द्वारा स्वीकृत, उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सचेत रूप से प्रयत्न करते हैं तभी सामाजिक प्रगति सम्भव होती है। उदाहरण के लिए, आज हमारे देश भारत में प्रगति के अनेक सचेत प्रयत्न हो रहे हैं जिनमें से पंचवर्षीय योजनाओं (Five Year Plans) का प्रमुख रूप से उल्लेख किया जा सकता है। हिमा


(3) सामूहिक उन्नति (Collective Progress)- सामाजिक प्रगति की एक विशेषता यह भी है कि जब किसी व्यक्ति विशेष की उन्नति हो रही है या किसी, विशेष समूह को लाभ पहुँच रहा है तो उसे सामाजिक प्रगति नहीं कहा जाता। सामाजिक प्रगति तो सबकी प्रगति है। वास्तव में जब समूह के अधिकतर व्यक्तियों को लाभ होता है, तो वह स्थिति सामाजिक प्रगति की ही होती है।


(4) इच्छित लक्ष्य (Desired Goal) - प्रत्येक सामाजिक प्रगति का एक स्वीकृत या इच्छित लक्ष्य होता है। यह लक्ष्य या उद्देश्य समूह के द्वारा निश्चित होता है और समूह या समाज इस उद्देश्य या लक्ष्य को अपने सामाजिक मूल्यों (social values), आदर्श, परम्परा, प्रथा आदि के आधार पर निश्चित करता है। उदाहरण के लिए, भारतीय आदर्श आध्यात्मवादी (spiritualistic) है, इसलिए सामाजिक प्रगति का उद्देश्य निर्धारित करते समय यहाँ पर भौतिक प्रगति पर अत्यधिक बल नहीं दिया जाता। परन्तु इसके विपरीत अमेरिका में सामाजिक प्रगति का उद्देश्य भौतिक उन्नति ही होगा क्योंकि उस समाज का मूल्य उसी के अनुरूप है।


(5) हानि कम, लाभ अधिक (More benefits, Less losses) - इसमें सन्देह नहीं कि सामाजिक प्रगति भी एक प्रकार का परिवर्तन है परन्तु यह एक ऐसा परिवर्तन है जिससे समाज को या समाज के सदस्यों को हानि से लाभ कहीं अधिक होता है।


(6) प्रगति की धारणा परिवर्तनशील है (Progress is an Everchanging Concept)-सामाजिक प्रगति की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि यह एक स्थित (static) धारणा नहीं है। साथ ही इसमें समयानुसार परिवर्तन होता रहता है। इसका प्रमुख कारण भी स्पष्ट ही है और वह यह है कि सामाजिक प्रगति का बहुत कुछ प्रत्यक्ष सम्बन्ध सामाजिक मूल्यों से होता है और सामाजिक मूल्य समय-समय पर बदलते ही रहते हैं। उदाहरण के लिए, 100 वर्ष पूर्व भारत के सामाजिक मूल्यों में भौतिकवादी तत्त्व इतना अधिक नहीं था, जितना कि आज है। शायद इसीलिए आज देश की सामाजिक प्रगति में भौतिक उन्नति पर बल दिया जाने लगा है।




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