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विकास ||Development

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  विकास (Development) सामाजिक विकास, विकास की अवधारणा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलू है। विकास एक सतत एवं परिवर्तन की प्रक्रिया है। विकास सामाजिक संरचना के प्रत्येक पहलू में होता है चाहे वह सामाजिक हो या आर्थिक, धार्मिक हो या फिर सांस्कृतिक । सामाजिक विकास संरचना के सामाजिक पक्ष से सम्बन्धित है। इस रूप में सामाजिक विकास की अवधारणा महत्त्वपूर्ण होने के साथ-साथ व्यापक भी हो जाती है। यही कारण है कि समाजशास्त्रीय कृतियों में विकास सम्बन्धी विवेचन में सर्वाधिक उल्लेख सामाजिक विकास का ही मिलता है। सामाजिक विकास का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Social Development) यद्यपि पूरे (W.E. Moore: Social Change) और पारसन्स (Talcott Parsons: Structure and Process in Modern Societies) जैसे समाजशास्त्रियों ने भी अपनी कृतियों में सामाजिक विकास की अवधारणा का उल्लेख किया है। किन्तु सामाजिक विकास पर सबसे महत्त्वपूर्ण विचार हॉबहाऊस (L.T. Hobbhose, Social Development) में है। हॉबहाऊस ने साभाजिक विकास का अर्थ मानव मस्तिष्क के विकास से लगाया है, जिससे मनुष्य का मानसिक विकास होता है और अन्ततः ...

यूरोप और भारत में समाजशास्त्र की उत्पत्ति || Genesis of Sociology in Europe and India

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  यूरोप और भारत में समाजशास्त्र की उत्पत्ति, और ऑगस्त कॉम्टे और हर्बर्ट स्पेंसर के योगदान ( Genesis of Sociology in Europe (French Revolution and Renaissance) and India, Contribution of Comte and Spencer) समाजशास्त्र, एक विशिष्ट शैक्षणिक अनुशासन के रूप में, 19वीं सदी में उभरा, जिसे यूरोप में गहन सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक परिवर्तनों और भारत में कुछ हद तक इसके अद्वितीय सामाजिक-सांस्कृतिक और औपनिवेशिक संदर्भों ने आकार दिया। फ्रांसीसी क्रांति (1789–1799) और पुनर्जागरण (14वीं से 17वीं सदी) ने यूरोप में समाजशास्त्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण परिस्थितियाँ प्रदान कीं, जबकि भारत में समाजशास्त्रीय विचारधारा इसके विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक और औपनिवेशिक संदर्भों के माध्यम से विकसित हुई। ऑगस्त कॉम्टे और हर्बर्ट स्पेंसर के योगदानों ने समाजशास्त्र को एक व्यवस्थित अध्ययन क्षेत्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह निबंध यूरोप और भारत में समाजशास्त्र की उत्पत्ति, फ्रांसीसी क्रांति और पुनर्जागरण के प्रभाव, और कॉम्टे और स्पेंसर के योगदानों का मूल्यांकन करता है।  यूरोप में ...

उद्विकास || Evolution

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                                उद्विकास    (Evolution) डार्विन के प्राणीशास्त्रीय उद्विकास के सिद्धान्त के आधार पर अनेक मानवशास्त्रियों ने समाज तथा संस्कृति के विकास को समझाने का प्रयत्न किया। उनका कहना है कि जिस प्रकार प्राणीशास्त्रीय शरीर का उद्दिद्वकास कुछ निश्चित नियमों के अनुसार होता है, उसी प्रकार समाज एवं संस्कृति का विकास हुआ है। सामाजिक उद्विकास को समझने के लिए यह आवश्यक है कि पहले डार्विन के उद्दिकासीय सिद्धान्त को समझ लिया जाए क्योंकि इसी पर सामाजिक उद्दिकास का सिद्धान्त आधारित है। परन्तु इससे भी पहले उद्दिकास के अर्थ एवं परिभाषा का विवेचन करना आवश्यक होगा। उद्विकास का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Evolution) साधारण शब्दों में, उ‌द्विकास का अर्थ है-एक सादी और सरल वस्तु का धीरे-धीरे एक जटिल अवस्था में बदल जाना अर्थात् जब कुछ निश्चित स्तरों में से गुजरती हुई कोई सादी या सरल वस्तु एक जटिल वस्तु में परिवर्तन हो जाती है तो उसे उ‌द्विकास कहते हैं। मैकाइवर तथा पेज- "उद्व...

प्रगति || Progress

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प्रगति (Progress) 'प्रगति' शब्द के बारे में कोई एक मत नहीं है क्योंकि प्रत्येक काल, देश और व्यक्ति के लिए इस शब्द का अलग-अलग अर्थ हो सकता है। उदाहरण के लिए, उन्नत देशों में प्रगति का मापदण्ड भौतिक उन्नति (Material Progress) है। जो देश आर्थिक दृष्टिकोण से जितना आगे बढ़ा हुआ है, उसे उतना ही प्रगतिशील देश माना जाता है। भारत और विश्व के अन्य देशों के धार्मिक गुरुओं ने आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Progress) को ही वास्तविक प्रगति माना है। यद्यपि यह धारणा अब बदल रही है। प्रत्येक युग में प्रगति की अवधारणा भी बदलती है। सतयुग में प्रगति का जो अर्थ था, कलयुग में वह निश्चय ही परिवर्तित हो गया है। विश्वस्तरीय संगठन जैसे यू.एन.ओ. (U.N.O.) ने मानव संसाधन को जीवन स्तर (Living Standard) की बेहतरी या प्रगति का सूचक माना है। आइए, सामाजिक प्रगति के अर्थ एवं परिभाषा को समझे। प्रगति का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Progress) 'प्रगति' शब्द अंग्रेजी के 'Progress', शब्द का हिन्दी रूपांतर है। ये शब्द लैटिन के (Progreditior) शब्द से निकला है। इसका अर्थ 'आगे बढ़ना'...

सामाजिक परिवर्तन का अर्थ एवं परिभाषा || MEANING AND DEFINITION OF SOCIAL CHANGE

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 सामाजिक परिवर्तन का अर्थ एवं परिभाषा (MEANING AND DEFINITION OF SOCIAL CHANGE) सामान्यतः सामाजिक परिवर्तन का तात्पर्य समाज में घटित होने वाले परिवर्तनों से है। प्रारम्भ में समाज-वैज्ञानिकों ने उद्विकास, प्रगति एवं सामाजिक परिवर्तनों में कोई भेद नहीं किया था और वे इन तीनों अवधारणाओं का प्रयोग एक ही अर्थ में करते थे। पहली बार सन् 1922 में ऑगबर्न ने अपनी पुस्तक 'Social Change' में इनमें पाये जाने वाले भेद को स्पष्ट किया। उनके बाद से समाजशास्त्रीय साहित्य में इन शब्दों का काफी प्रयोग हुआ है। कुछ विद्वानों ने सामाजिक ढांचे में होने वाले परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन कहा है तो कुछ ने सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तनों को। सम्पूर्ण समाज अथवा उसके किसी भी पक्ष में होने वाले परिवर्तनों को हम सामाजिक परिवर्तन कहेंगे। सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा को स्पष्टतः समझने के लिए हम विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गयी कुछ परिभाषाओं का यहां उल्लेख करेंगे : मैकाइबर एवं पेज के अनुसार , "समाजशास्त्री होने के नाते हमारी विशेष रुचि प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक सम्बन्धों में है। केवल इन सामाजिक स...

सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा || CONCEPT OF SOCIAL CHANGE

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 सामाजिक परिवर्तन की अवधारणा (CONCEPT OF SOCIAL CHANGE) परिवर्तन प्रकृति का एक शाश्वत एवं अटल नियम है। मानव समाज भी उसी प्रकृति का अंग होने के कारण परिवर्तनशील है। समाज की इस परिवर्तनशील प्रकृति को स्वीकार करते हुए मैकाइबर लिखते हैं, "समाज परिवर्तनशील एवं गत्यात्मक है।" बहुत समय पूर्व ग्रीक विद्वान हेरेक्लिटिस ने भी कहा था. "सभी वस्तुएं परिवर्तन के बहाव में हैं। " उसके बाद भी इस बात पर बहुत विचार किया जाता रहा है कि मानव की क्रियाएं क्यों और कैसे परिवर्तित होती हैं? समाज के वे क्या विशिष्ट स्वरूप हैं जो व्यवहार में परिवर्तन को प्रेरित करते हैं? समाज में आविष्कार परिवर्तन कैसे लाते हैं एवं आविष्कार करने वालों की शारीरिक विशेषताएं क्या होती हैं? परिवर्तन को शीघ्र ग्रहण करने एवं ग्रहण न करने वालों की शरीर रचना में क्या भिन्नता होती है? क्या परिवर्तन किसी निश्चित दिशा से गुजरता है? यह दिशा रेखीय है या चक्रीय ? परिवर्तन के सन्दर्भ में इस प्रकार के अनेक प्रश्न उठाये गये तथा उनका उत्तर देने का प्रयास किया गया। मानव में परिवर्तन को समझने के प्रति जिज्ञासा पैदा हुई। उसने परि...

सामाजिक समस्याओं के अध्ययन के दृष्टिकोण || Approaches to the study of social problems

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    सामाजिक समस्याओं के अध्ययन के दृष्टिकोण समकालीन काल में समाज द्वारा सामाजिक समस्याओं को समझने के तरीके में उल्लेखनीय बदलाव आया है। पहले सामाजिक समस्याओं और उनके मूल की व्याख्या व्यक्ति पर केंद्रित होती थी। ऐसी समस्याओं का कारण व्यक्ति की आनुवंशिक संरचना में देखा जाता था और माना जाता था कि उनका समाधान संभव नहीं है। अब सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक या संरचनात्मक कारकों पर ज़ोर दिया जाता है। इस प्रकार, समकालीन दृष्टिकोण सामाजिक समस्या के कारण को व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि सामूहिक स्तर पर देखता है। इसके अलावा, पहले सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने और संतुलन बनाए रखने पर ज़ोर दिया जाता था, जो सामाजिक परिवर्तन को एक संदिग्ध घटना बनाता था। अब, यह स्वीकार किया जाता है कि सामाजिक व्यवस्था में विद्यमान अंतर्विरोधों के कारण तनाव और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिन्हें इन अंतर्विरोधों को दूर करके हल किया जा सकता है। वर्तमान में, सामाजिक समस्याओं की प्रकृति और उत्पत्ति का अध्ययन करने के लिए दो महत्वपूर्ण दृष्टिकोण हैं। वे हैं: कार्यात्मक दृष्टिकोण, मार्क्सवादी दृष्टिकोण...

सामाजिक समस्या का परिचय || Introduction To Social Problem

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 सामाजिक समस्या का परिचय Introduction To Social Problem उद्देश्य इस इकाई का उद्देश्य सामाजिक समस्याओं की अवधारणा को परिभाषित करके और सामाजिक समस्याओं को जन्म देने वाले विभिन्न कारणात्मक एवं व्यवस्थित कारकों को समझकर सामाजिक समस्याओं को समझने के लिए एक ढाँचा विकसित करना है। सामाजिक समस्याओं के अध्ययन के दृष्टिकोणों की रूपरेखा तैयार करने का भी प्रयास किया गया है। इस इकाई को पढ़ने के बाद, आप निम्न कार्य कर पाएँगे: सामाजिक समस्याओं की अवधारणा को समझना और परिभाषित करना; सामाजिक समस्याओं की विशेषताओं और प्रकारों को स्पष्ट करना; सामाजिक समस्याओं को जन्म देने वाले सामाजिक और कारणात्मक कारकों पर चर्चा करना; सामाजिक समस्याओं के अध्ययन के विभिन्न दृष्टिकोणों का वर्णन करना; औ सामाजिक समस्याओं के प्रति सामाजिक प्रतिक्रिया की व्याख्या करना।   प्रस्तावना कुछ प्रतिकूल परिस्थितियाँ, जिनके हानिकारक परिणाम हो सकते हैं, समाज को प्रभावित कर सकती हैं। ये समाज के सामान्य कामकाज में बाधा डाल सकती हैं। ऐसी हानिकारक परिस्थितियों को सामाजिक समस्याएँ कहा जाता है। ये समस्याएँ इसलिए उत्पन्न होती हैं क्योंक...

समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति के विरुद्ध कुछ आपत्तियां || SOME OBJECTIONS AGAINST THE SCIENTIFIC NATURE OF SOCIOLOGY

 समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति के विरुद्ध कुछ आपत्तियां  (SOME OBJECTIONS AGAINST THE SCIENTIFIC NATURE OF SOCIOLOGY) कुछ विचारकों की मान्यता है कि प्राकृतिक विज्ञानों का लक्ष्य 'कारण सम्बन्धी व्याख्या' प्रस्तुत करना है, जबकि सामाजिक-सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विज्ञानों का लक्ष्य अर्थ का 'निर्वचन' करना या उसे समझना है। वे समाजशास्त्र को विज्ञान मानने से इन्कार करते हैं, इसकी वैज्ञानिक प्रकृति पर आपत्ति उठाते हैं। उनके द्वारा उठायी गयी आपत्तियां इस प्रकार हैं: (1) वैषयिकता (तटस्थता) का अभाव वैषयिकता या तटस्थता का अर्थ पक्षपात-रहित अध्ययन से है। समाजशास्त्र की वैज्ञानिक प्रकृति के विरुद्ध एक तर्क यह दिया जाता है कि यह प्राकृतिक विज्ञानों के समान अपनी अध्ययन-वस्तु का वस्तुनिष्ठता के साथ अध्ययन नहीं कर सकता। इसका कारण यह दिया जाता है कि समाजशास्त्र जिस समाज, जाति, परिवार, धर्म, सामाजिक संस्थाओं, सामाजिक समस्याओं, सामाजिक मूल्यों, आदि का अध्ययन करता है, वह स्वयं भी इनमें भागीदार होता है, इनका एक अंग होता है। अतः इन सबके वस्तुनिष्ठ अध्ययन में उसकी स्वयं की रुचि, रुझान, पूर्वा...

समाजशास्त्र विज्ञान क्यों (प्रकृति) || WHY SOCIOLOGY A SCIENCE (NATURE)

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समाजशास्त्र विज्ञान क्यों (प्रकृति) WHY SOCIOLOGY A SCIENCE (NATURE) समाजशास्त्र एक विज्ञान है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है, अवलोकन विधि की सहायता से तथ्य एकत्रित किये जाते हैं, उन्हें व्यवस्थित और क्रमबद्ध किया जाता है, पक्षपातरहित होकर निष्कर्ष निकाले जाते हैं तथा सिद्धान्तों का निर्माण किया जाता है। समाजशास्त्र को विज्ञान मानने का प्रमुख आधार या कसौटियां निम्नलिखित हैं : (1) समाजशास्त्रीय ज्ञान का आधार वैज्ञानिक पद्धति है- समाजशास्त्र तथ्यों के संकलन के लिए वैज्ञानिक पद्धति को काम में लेता है। मूर्त और अमूर्त सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के लिए समाजशास्त्र विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग करता है। उदाहरण के रूप में, समाजशास्त्र में ज्ञान प्राप्त करने या तथ्य एकत्रित करने हेतु समाजमिति (Sociometry), अवलोकन पद्धति, अनुसूची, अथवा प्रश्नावली पद्धति, सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति, वैयक्तिक जीवन-अध्ययन पद्धति, सांख्यिकीय पद्धति, साक्षात्कार पद्धति, ऐतिहासिक पद्धति, आदि का प्रयोग किया जाता है। (2) समाजशास्त्र में अवलोकन द्वारा तथ्यों को एकत्रित किया जाता है - समाजशास्त...

समाजशास्त्र की प्रकृति (NATURE OF SOCIOLOGY)

  समाजशास्त्र की प्रकृति NATURE OF SOCIOLOGY "विज्ञान, विज्ञान ही है चाहे वह भौतिकशास्त्र में हो या समाजशास्त्र में।"---- लेडिस  आज भी समाजशास्त्रीयों में इस सम्बन्ध में मत-भिन्नता पायी जाती है कि समाजशास्त्र विज्ञान है या नहीं अथवा यह कभी विज्ञान भी बन सकता है। ऑगस्ट कॉम्ट समाजशास्त्र को सदैव एक विज्ञान मानते रहे और आपने तो इसे 'विज्ञानों की रानी' की संज्ञा दी। कुछ समाजशास्त्री समाजशास्त्र को विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे। ऐसा प्रयत्न करने वाले विद्वानों में दुर्खीम, मैक्स वेबर तथा पैरेटो, आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। समाजशास्त्र को विज्ञान नहीं मानने वाले विद्वानों का कहना है कि यह विज्ञान कैसे हो सकता है जबकि इसके पास कोई प्रयोगशाला नहीं है, जब यह अपनी विषय-सामग्री को मापने में समर्थ नहीं है और जब यह भविष्यवाणी भी नहीं कर सकता है। साथ ही उनका यह भी कहना है कि सामाजिक घटनाओं की स्वयं की कुछ ऐसी आन्तरिक सीमाएँ हैं जो समाजशास्त्र के एक विज्ञान का दर्जा प्राप्त करने में बाधक हैं। यही बात अन्य सामाजिक विज्ञानों के सम्बन्ध में भी कही जाती है। विज...

समाजशास्त्र के बारे में बीरस्टीड के विचार // BIERSTEDT'S VIEWS REGARDING SOCIOLOGY

 समाजशास्त्र के बारे में बीरस्टीड के विचार  (BIERSTEDT'S VIEWS REGARDING SOCIOLOGY) बीरस्टीड ने समाजशास्त्र की कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया है जो इसे अन्य विज्ञानों से भिन्न बनाती हैं। ये विशेषताएं निम्नलिखित हैं: (1) समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है न कि प्राकृतिक विज्ञान (Sociology is a Social not a natural science)- समाजशास्त्र की विषय-वस्तु अन्य विज्ञानों से भिन्न है, किन्तु अध्ययन विधि नहीं। इस आधार पर हम समाजशास्त्र को उन विज्ञानों से भिन्न कर सकते हैं जो भौतिक जगत का अध्ययन करते हैं। इस प्रकार समाजशास्त्र ज्योतिष विज्ञान, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, भूगर्भशाख एवं जीवशास्त्र से भिन्न है।  (2) समाजशास्त्र वास्तविकता का अध्ययन करने वाला विज्ञान है, यह एक आदर्शात्मक विज्ञान नहीं है (Sociology is a categorical not a normative science) समाजशास्त्र 'क्या है' का अध्ययन करता है न कि 'क्या होना चाहिए' का। विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र मूल्यों की चर्चा नहीं करता, वह यह नहीं बताता कि समाज को किस दिशा में जाना चाहिए, यह सामाजिक नीति निर्धारण के लिए भी कोई सुझाव नहीं देत...

समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र: SCOPE OF SOCIOLOGY

    समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र   (SCOPE OF SOCIOLOGY ) इंकल्स कहते हैं कि "समाजशास्त्र परिवर्तनशील समाज का अध्ययन करता है, इसलिए समाजशास्त्र के अध्ययन की न तो कोई सीमा निर्धारित की जा सकती है और न ही इसके अध्ययन क्षेत्र को बिल्कुल स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जा सकता है।" क्षेत्र का तात्पर्य यह है कि वह विज्ञान कहां तक फैला हुआ है। अन्य शब्दों में क्षेत्र का अर्थ उन सम्भावित सीमाओं से है जिनके अन्तर्गत किसी विषय या विज्ञान का अध्ययन किया जा सकता है। समाजशास्त्र के विषय-क्षेत्र के सम्बन्ध में विद्वानों के मतों को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है : (1) स्वरूपात्मक अथवा विशिष्टात्मक सम्प्रदाय (Formal or Specialistic or Particularistic School), तथा (2) समन्वयात्मक सम्प्रदाय  (Synthetic School)।   प्रथम मत या विचारधारा के अनुसार समाजशास्त्र एक विशेष विज्ञान है और द्वितीय विचारधारा के अनुसार समाजशास्त्र एक सामान्य विज्ञान है। (1) स्वरूपात्मक सम्प्रदाय (Formal School)  इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक जर्मन समाजशास्त्री जार्ज सिमैल हैं। इस सम्प्रदाय से सम्बन्धित अ...

समाजशास्त्र क्या है: What is sociology

यद्यपि मनुष्य आदि-काल से ही समाज में रहता है, परन्तु उसने समाज और अपने स्वयं के अध्ययन में काफी देर से रुचि लेना प्रारम्भ किया। सर्वप्रथम मनुष्य ने प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन किया, अपने चारों ओर के पर्यावरण को समझने का प्रयत्न किया और अन्त में स्वयं के अपने समाज के विषय में सोचना-विचारना शुरू किया। यही कारण है कि पहले प्राकृतिक विज्ञानों का विकास हुआ और उसके पश्चात् सामाजिक विज्ञानों का। सामाजिक विज्ञानों के विकास-क्रम में समाजशास्त्र का एक विषय के रूप में विकास काफी बाद में हुआ। पिछली शताब्दी में ही इस नवीन विषय को अस्तित्व में आने का अवसर मिला। इस दृष्टि से अन्य सामाजिक विज्ञानों की तुलना में समाजशास्त्र एक नवीन विज्ञान है। समाजशास्त्र 'समाज' का ही विज्ञान या शास्त्र है। इसके द्वारा समाज या सामाजिक जीवन का अध्ययन किया जाता है। इस नवीन विज्ञान को जन्म देने का श्रेय फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान आगस्त कॉम्ट (Auguste Comte) को है। आगस्त कॉम्ट ही सर्वप्रथम सन् 1838 में इस नवीन शास्त्र को 'समाजशास्त्र' (Sociology) नाम दिया। इसी कारण 'समाजशास्त्र का जनक' (Father of So...