समाजशास्त्र विज्ञान क्यों (प्रकृति) || WHY SOCIOLOGY A SCIENCE (NATURE)

समाजशास्त्र विज्ञान क्यों (प्रकृति)
WHY SOCIOLOGY A SCIENCE (NATURE)


समाजशास्त्र एक विज्ञान है क्योंकि इसमें वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग किया जाता है, अवलोकन विधि की सहायता से तथ्य एकत्रित किये जाते हैं, उन्हें व्यवस्थित और क्रमबद्ध किया जाता है, पक्षपातरहित होकर निष्कर्ष निकाले जाते हैं तथा सिद्धान्तों का निर्माण किया जाता है। समाजशास्त्र को विज्ञान मानने का प्रमुख

आधार या कसौटियां निम्नलिखित हैं :
(1) समाजशास्त्रीय ज्ञान का आधार वैज्ञानिक पद्धति है- समाजशास्त्र तथ्यों के संकलन के लिए वैज्ञानिक
पद्धति को काम में लेता है। मूर्त और अमूर्त सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के लिए समाजशास्त्र विभिन्न वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग करता है। उदाहरण के रूप में, समाजशास्त्र में ज्ञान प्राप्त करने या तथ्य एकत्रित करने हेतु समाजमिति (Sociometry), अवलोकन पद्धति, अनुसूची, अथवा प्रश्नावली पद्धति, सामाजिक सर्वेक्षण पद्धति, वैयक्तिक जीवन-अध्ययन पद्धति, सांख्यिकीय पद्धति, साक्षात्कार पद्धति, ऐतिहासिक पद्धति, आदि का प्रयोग किया जाता है।

(2) समाजशास्त्र में अवलोकन द्वारा तथ्यों को एकत्रित किया जाता है - समाजशास्त्र को विज्ञान मानने का एक अन्य आधार अनुसन्धानकर्ता द्वारा तथ्यों के संकलन हेतु प्रत्यक्ष निरीक्षण और अवलोकन करना है। समाजशास्त्र में काल्पनिक या दार्शनिक विचारों को कोई स्थान नहीं दिया जाता। इसमें तो अध्ययनकर्ता स्वयं घटना-स्थल पर पहुंचकर घटनाओं का निरीक्षण और तथ्यों का संकलन करता है।

(3)समाजशास्त्र में तथ्यों का वर्गीकरण एवं विश्लेषण किया जाता है- असम्बद्ध या बिखरे हुए आंकड़ों या तथ्यों के आधार पर कोई वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालना सम्भव नहीं है। सही निष्कर्ष निकालने के लिए यह आवश्यक है कि प्राप्त तथ्यों को व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध किया जाये। इसके लिए तथ्यों को समानता के आधार पर विभिन्न वर्गों में बांटा जाता है। यह कार्य वर्गीकरण के अन्तर्गत आता है। इसके पश्चात् तथ्यों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया जाता है। समाजशास्त्र को विज्ञान मानने का एक प्रमुख कारण यह है कि इसमें सही निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए तथ्यों का वर्गीकरण एवं विश्लेषण किया जाता है।

(4) समाजशास्त्र में 'क्या है' का वर्णन किया जाता है-अन्य शब्दों में समाजशास्त्र में वास्तविक घटनाओं की विवेचना की जाती है। यह शास्त्र इस बात पर विचार नहीं करता कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है अथवा क्या होना चाहिए, और क्या नहीं होना चाहिए। यह तो घटनाओं या तथ्यों का यथार्थ चित्रण करता है, वे जिस रूप में हैं उनका ठीक वैसा ही चित्रण करता है। यह तो 'क्या है' का ही उल्लेख करता है।

(5) समाजशास्त्र में कार्य-कारण सम्बन्धों की विवेचना की जाती है- समाजशास्त्र 'क्या है' का वर्णन करके ही सन्तुष्ट नहीं हो जाता है। इसमें तो घटनाओं, तथ्यों और विभिन्न समस्याओं के कार्य-कारण सम्बन्धों को जानने का प्रयत्न किया जाता है। यह शाख तो किसी घटना या समस्या के पीछे छिपे कारणों की खोज करता है। यह तो यह मानकर चलता है कि कोई भी घटना जादुई चमत्कार से घटित नहीं होकर कुछ विशिष्ट कारणों से घटित होती है जिसका पता लगाना समाजशास्त्री का दायित्व है। कार्ल मार्क्स का वर्ग-संघर्ष का सिद्धान्त एवं दुर्खीम का आत्महत्या का सिद्धान्त कार्य-कारण के सह-सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं।

(6) समाजशास्त्र में सिद्धान्तों की स्थापना की जाती है- समाजशास्त्र में कार्य-कारण सम्बन्धों की विवेचना की जाती है, तथ्यों या घटनाओं के पारस्परिक सम्बन्ध ज्ञात किये जाते हैं, वर्गीकरण तथा विश्लेषण किया जाता है और तत्पश्चात् सामान्य निष्कर्ष निकाले जाते हैं। इन निष्कर्षों के आधार पर ही समाजशास्त्रीय सिद्धान्त या वैज्ञानिक नियम बनाये जाते हैं।

(7) समाजशात्रीय सिद्धान्तों की पुनर्परीक्षा सम्भव है समाजशास्त्र भी भौतिकशास्त्र या रसायनशास्त्र के समान अपने सिद्धान्तों या नियमों की परीक्षा एवं पुनर्परीक्षा करने में सक्षम है। इसमें वैज्ञानिक पद्धति की सहायता से तथ्य एकत्रित किये जाते हैं और इस पद्धति से प्राप्त तथ्यों की प्रमुख विशेषता यही है कि इनकी प्रामाणिकता की जाँच की जा सकती है। समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों की जांच करना वास्तव में सम्भव है।

(8) समाजशास्त्र के सिद्धान्त सार्वभौमिक (Universal) हैं-समाजशास्त्र वैज्ञानिक पद्धति को काम में लेता हुआ जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है, वे सार्वभौमिक प्रकृति के होते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि यदि परिस्थितियाँ समान रहें तो समाजशास्त्रीय सिद्धान्त विभिन्न समाजों और कालों में खरे उतरते हैं।

(9) (9) समाजशास्त्र में भविष्यवाणी (Prediction) करने की क्षमता है- समाजशास्त्र इस कारण भी विज्ञान माना जाता है कि यह 'क्या है' के आधार पर 'क्या होगा' बताने अर्थात भविष्यवाणी करने में समर्थ है। अन्य शब्दों में, इस शाख में अपने वर्तमान ज्ञान भण्डार के आधार पर भविष्य की ओर संकेत करने की क्षमता है। समाज में वर्तमान में होने वाले परिवर्तन को ध्यान में रखकर समाजशास्त्र यह बता सकता है कि भविष्य में सामाजिक व्यवस्था का रूप क्या होगा, जाति-व्यवस्था किस रूप में रहेगी तथा परिवारों के कीन से प्रकार विकसित होंगे।
  

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